तिथियों के प्रकार

“ॐ हरि हर नमो नमःॐ”
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१• अखंडा एवं खंडा तिथि
जो तिथि सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्याप्त रहे वह अखंडा और जो सूर्योदय से दोपहर (दिनमान के आधे भाग) तक न रहे वह खंडा तिथि होती है। खंडा तिथि में व्रत प्रारंभ या उद्यापन नहीं करना चाहिए।

२• पूर्व विद्धा
आज जिस तिथि पर हम विचार कर रहे हैं यदि वह तिथि पिछली तिथि से पिछले दिन संयुक्त होकर आई हो तो आज की तिथि पूर्व विद्धा कहलाती है। उदाहरण के लिये आज मंगलवार को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि है, पिछले दिन (सोमवार को) पिछली (दशमी तिथि) रात १ बजे तक थी। और एकादशी लग गई थी। यानि की दोनों तिथियां पिछले दिन रात १ वजे संयुक्त थीं। अतः यहां एकादशी पूर्व विद्धा कहलायेगी। यह तिथि आने वाले अगले सूर्योदय के पहले ही समाप्त होती है।

३. पराविद्धा
आज जिस तिथि पर हम विचार कर रहे हैं यदि वह तिथि अगली आने वाली तिथि से अगले आने वाले दिन संयुक्त हो तो आज की तिथि परा विद्धा कहलाती है। यह तिथि आने वाले अगले सूर्योदय के वाद समाप्त होती है।

४. युक्ता तिथि
किसी एक दिन एक तिथि समाप्त होती है उसी समय दूसरी तिथि प्रारंभ होती है ऐसी स्थिति में दोनों तिथियां परस्पर युक्ता तिथियां होती हैं। उपरोक्त उदाहरण में सोमवार की रात्रि में १ वजे दशमी तथा एकादशी संयुक्त होने से हम यह कहेंगे कि सोमवार को दशमी तथा एकादशी युक्ता तिथियां हैं।

५. शुद्धा तिथि
‘सूर्योदयारंभ पुनः सूर्योदयपर्यन्ता शुद्धा – तिथिनिर्णय।
अर्थात् – जो तिथि सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक रहे वह शुद्धा होती है, अतः स्पष्ट है कि, जो तिथि वृद्धि को प्राप्त होती है, केवल वही शुद्धा हो सकती है, अन्य सब विद्धा होतीं हैं।

॥ श्रीरस्तु ॥
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श्री हरि हरात्मक देवें सदा, मुद मंगलमय हर्ष।
सुखी रहे परिवार संग, अपना भारतवर्ष ॥
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संकलनकर्ता –
श्रद्धेय पंडित विश्वनाथ द्विवेदी ‘वाणी रत्न’
संस्थापक, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष संस्थान)
संपर्क सूत्र – 07089434899
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