व्रत भंग कब होता है ?
“ॐ हरि हर नमो नमःॐ”
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१. क्रोधात् प्रमादाल्लोभद् वा व्रतभंगो भवेद् । (गरुड़पुराण)
२. असकृज्जलपानाश्च सकृत्ताम्बूलभक्षणात् ।
उपवासः प्रणश्येत दिवास्वापाच्य मैथुनात् ॥ (विष्णु पुराण)
अर्थात् – विभिन्न पुराणों के अनुसार दिन में सोने से, बार-बार जल पीने से, तांबूल (पान) चबाने से, स्त्री सहवास करने से, क्रोध, लोभ, हिंसा इत्यादि मनोविकार उत्पन्न होने पर, अयोग्य हविष्य खाने पर व्रत भंग हो जाता है।
व्रत का अर्थ होता है किसी चीज का संकल्प लेकर व्रत का पालन करना। ऐसे में व्रत का अर्थ है प्रण या प्रतिज्ञा। एकादशी, पूर्णिमा, सोमवार, मंगलवार या किसी भी अन्य दिन पर देवी या देवता को समर्पित व्रत किया जाता है। व्रत हमारे आत्मिक बल और आत्म नियंत्रण को तो बढ़ाते ही हैं साथ ही व्यक्ति को इसके शारीरिक लाभ भी देखने को मिल सकते हैं।
व्रत में दिन के समय नहीं सोना चाहिए, वरना व्यक्ति का व्रत खंडित माना जाता है। इसके साथ ही व्रत के दौरान किसी की बुराई, निंदा, चुगली और झूठ आदि बोलने से भी व्रत खंडित माना जाता है। साथ ही यह भी माना गया है कि व्रत में बार-बार कुछ-न-कुछ खाते रहने से भी व्रत खंडित हो सकता है। ऐसे में इस बातों का विशेष तौर से ध्यान रखना चाहिए।
यदि किसी कारणवश आपका व्रत टूट गया है, तो ऐसे में आप कुछ कार्यों को करके इसके बुरे परिणामों से बच सकते हैं। जिस भी चीज को खाने से आपका व्रत टूटा है उसका दान करना चाहिए। जैसे यदि आपका व्रत पानी पीने के कारण टूटा है, तो ऐसे में जल का दान करना चाहिए। वहीं, आप व्रत टूटने पर छोटा-सा हवन कर ईश्वर से क्षमा मांग सकते हैं।
॥ श्रीरस्तु ॥
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श्री हरि हरात्मक देवें सदा, मुद मंगलमय हर्ष।
सुखी रहे परिवार संग, अपना भारतवर्ष ॥
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संकलनकर्ता –
श्रद्धेय पंडित विश्वनाथ द्विवेदी ‘वाणी रत्न’
संस्थापक, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष संस्थान)
संपर्क सूत्र – 07089434899
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