अथ महामृत्युंजय मन्त्र जप प्रयोग

Shri Mahamrityunjaya Mantra Hari Har Haratmak

पवित्र आसन पर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठें। आचमन और प्राणायाम करके। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्पादि लेकर संकल्प करें। संकल्प में मंत्र की उस जप संख्या का उल्लेख करें, जिसे आप करने जा रहे हैं।

संकल्प

हरि ॐ तत्सत्। ॐ नमः श्री परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमाय श्रीमद्भगवते महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहरार्धे श्रीश्वेत वाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे जंबूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्य्यावर्तान्तर्गत क्षेत्रे सृष्टिसंवत्सराणांमध्ये ‘अमुक’ नाम्नि संवत्सरे, ‘अमुक’ अयने, ‘अमुक’ ऋतौ, ‘अमुक’ मासे, ‘अमुक’ पक्षे, ‘अमुक’ तिथौ, ‘अमुक’ नक्षत्रे, ‘अमुक’ योगे, ‘अमुक’ वासरे, ‘अमुक’ राशिस्थे, सूर्ये, चंद्रे, भौमे, बुधे, बृहस्पतौ, शुक्रे, शनौ, राहो, केतौ एवं ग्रह गुण विशिष्टायां तिथौ, ‘अमुक’ गोत्रोत्पन्न, ‘अमुक ‘नाम्नि (शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि) ऽहं मम जन्मलग्नात् चन्द्रलग्नात् ये केचन चतुर्थाष्टम द्वादशस्थानस्थित क्रूरग्रहास्तेषां शान्तिपूर्वकं द्वितीय सप्तम एकादश स्थानस्थित शुभफल प्राप्त्यर्थं मानसिक शिव पूजन सहित श्री महामृत्युंजय देवता प्रीत्यर्थं च यथा संख्याकं महामृत्युंजय मंत्र जपमहं करिष्ये॥

(उपरोक्त संकल्प में जहां-जहां ‘अमुक’ शब्द आया है, वहां क्रमशः विद्यमान संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, योग, दिन, सूर्यादि नवग्रहों की स्थिति वाली राशियों के नाम, अपने गोत्र तथा अपने नाम का उच्चारण करना चाहिए। ब्राह्मण को ‘शर्माऽहं’, क्षत्रिय को ‘वर्माऽहं’, वैश्य को ‘गुप्तोऽहं ‘ तथा शूद्र को ‘दासोऽहं’ शब्द का उच्चारण नाम के साथ करना चाहिए। इसके पश्चात दाहिने हाथ में जल लेकर विनियोग करें)

अथ विनियोगः

ॐ अस्य श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्रस्य वाम देवकहोलवसिष्ठादि ऋषयः, पंक्तिर्गायत्री अनुष्टुप्छन्दांसि श्रीसदाशिव महामृत्युञ्जयरुद्रो देवता, श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ममाऽभीष्टसिद्धयर्थे जपे न्यास च विनियोगः॥

(विनियोग का मन्त्र पढ़कर भुमि पर जल छोड़ देंवें। इसके पश्चात ऋष्यादि न्यास करें)

ऋष्यादि न्यास

ॐ वसिष्ठऋषये नमः – शिरसि।
ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः – मुखे।
ॐ महामृत्युञ्जयरुद्रदेवतायै नमः – हृदये।
ॐ ह्रीं बीजाय नमः – नाभौ।
ॐ जूं शक्तये नमः – पादौ।
ॐ सः कीलकाय नमः – सर्वांङ्गे॥

करन्यास

ॐ त्र्यम्बकं – अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ यजामहे – तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं – मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ उर्वारुकमिव बन्धनात् – अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ मृत्योर्मुक्षीय – कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ माऽमृतात् – करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥

हृदयादिन्यास

ॐ त्र्यम्बकं – हृदयाय नमः।
ॐ यजामहे – शिरसे स्वाहा।
ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं – शिखायै वषट्।
ॐ उर्वारुकमिव बन्धनात् – कवचाय हुम्।
ॐ मृत्योर्मुक्षीय – नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ माऽमृतात् – अस्त्राय फट्॥

पदन्यास

ॐ त्र्यम्बकं – शिरसि। (से सिर का स्पर्श करें)
यजामहे – भ्रुवोः। (से दोनों भौहों का स्पर्श करें)
सुगन्धिं – नेत्रयोः। (से दोनों नेत्रों का स्पर्श करें)
पुष्टिवर्धनं – मुखे। (से मुख का स्पर्श करें)
उर्वारुकं – गण्डयोः। (से गले के दोनों भाग का स्पर्श करें)
इव – हृदये। (से हृदय का स्पर्श करें)
बन्धनात् – जठरे। (से नाभि के ऊपरी भाग का स्पर्श करें)
मृत्योर् – लिंङ्गे। (से लिंग का स्पर्श करें, पश्चात हाथ धोएं)
मुक्षीय – उर्वोः। (से दोनों जांघों का स्पर्श करें)
मां – जान्वोः। (से दोनों घुटनों का स्पर्श करें)
अमृतात् – पादयोः। (पढ़कर दोनों पैरों का स्पर्श करें)

इस प्रकार न्यास करके, मूल मन्त्र (ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्रयंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात ॐ स्वः भुवः भू ॐ सः जूं हौं ॐ”) पढते हुए दोनों हाथों द्वारा मस्तक से पैर तक सभी अंगों का स्पर्श करें।

ध्यान मन्त्र

(निम्न मन्त्र श्लोक का उच्चारण करते हुए भगवान महामृत्युंजय का ध्यान करें।)

हस्ताम्भोज युगस्थ कुंभयुगलादुद्धत्य तोयं शिरः,
सिंचन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वांके सकुम्भौ करौ।
अक्षस्त्रङ्मृगहस्तमंबुजगतं मूर्धस्थ चन्द्रस्त्रवत्,
पीयूषार्द्र तनुं भजे सगिरिजं मृत्युंजयं त्र्यंबकम्।
चंद्रोद्भासित मूर्धजं सुरपतिं पीयूषमात्रं वहद,
हस्ताब्जेन दधत् सुदिव्यममलं हास्यायपंकेरुहम्।
सूर्येन्द्वग्नि विलोचनं करतले पाशाऽक्ष सूत्राकुंशा,
म्भोज विभ्रतमक्षयं पशुपतिं मृत्युंजयं संस्मरे॥

मानस पूजा

ॐ लं पृथिव्यात्मकं, गन्धं समर्पयामि।
ॐ हं आकाशात्मकं, धूपं समर्पयामि
ॐ रं तेजोरूपं, दीपं समर्पयामि।
ॐ वं अमृतात्मकं, नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ सं सर्वात्मकं, मन्त्र पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि॥

माला स्तुति

जप करने के पूर्व माला की स्तुति तथा माला की प्रार्थना करें, जिस माला से आपको जप करना है।

अविघ्नं कुरु माले! गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

हे जपमालिके! तुम्हें मैं जप करने के लिए दाहिने हाथ में ग्रहण करता हूं, आप मेरे द्वारा किए हुए जप की सिद्धि के लिए प्रसन्न हों एवं मेरा जप निर्विघ्नतापूर्वक परिपूर्ण करें। अब संकल्पित संख्यानुसार महामृत्युंजय मन्त्र का जप करें।

अथ महामृत्युंजय जप मन्त्र

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्रयंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात ॐ स्वः भुवः भू ॐ सः जूं हौं ॐ॥

समर्पण

जप करने के उपरांत निम्नलिखित श्लोकों को पढ़ते हुए आचमनी से देवता के दाएं हाथ में जल छोड़ें।

गुह्याऽतिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणाऽस्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव! त्वत्प्रसादामहेश्वर॥

क्षमा मन्त्र

यदक्षरं पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।
पूर्णम् भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादात् महेश्वरिः॥

श्रद्धेय पंडित विश्वनाथ द्विवेदी ‘वाणी रत्न’
संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक
(“हरि हर हरात्मक” ज्योतिष संस्थान)
संपर्क – +91-7089434899

श्री हरिहरात्मक देवें सदा मुद मंगलमय हर्ष। सुखी रहे परिवार संग अपना भारतवर्ष॥

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