श्री हयग्रीव मन्त्र साधना प्रयोग
हायाग्रिवा में हया का मतलब है घोडे और ग्रिवा का अर्थ है गर्दन । यहां घोड़े को भगवान श्री विष्णु जी के रूप का सामना करना पड़ता हैं। राक्षस मधु और काइताभा ने श्री ब्रह्मा जीसे वेदों को चुरा लिया था उन वेदों वापस लाने के लिए भगवान श्री विष्णु जी को हयग्रीव का अवतार लेना पड़ा श्री हयग्रीव मंत्र का जो भी जातक नियमित रूप से पाठ करता है उसकी बुद्धि तेज़ व तीव्र हो जाती हैं। हम यहां आपको श्री हयग्रीव के मंत्र के साथ श्री हयग्रीव मूल मंत्र श्री हयग्रीव गायत्री मंत्र और पूजा मंत्र आदि बताने जा रहे हैं।
विनियोग
ॐ अस्य श्री ह्यग्रीव मन्त्रस्य, ब्रह्मा ऋषि, विष्णु देवताः, ऐं बीजं,
ह्सूं हय शिरसे नमः कीलकम् ममाऽभीष्ट सिध्दयर्थे जपे विनियोगः।
करन्यास
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं तर्जनीभ्यां नमः।
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं मध्यमाभ्यां नमः।
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं अनामिकाभ्यां नमः।
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ऐं ह्सूं हय शिरसे नमः ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥
हृदयादि न्यास
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं हृदयाय नमः।
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं शिरसे स्वाहा।
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं शिखायै वषट्।
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं कवचाय हुम्।
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्।
क्लीं ह्सूं हय शिरसे नमः क्लीं अस्त्राय फट्॥
श्री हयग्रीव ध्यान मंत्र
हस्तैर्दधानम् मालां च पुस्तकं वर पंकजम्।
कर्पूराभम् सौम्य-रूपम् नाना भूषणभूषितम्॥
श्री हयग्रीव जप मंत्र
(स्कंद पुराण के अनुसार)
“॥ॐ नमो भगवते आत्मविशोधनाय नमः॥”
यह मन्त्र सर्व सिद्धि प्रदायक है। सिद्धि हेतु इसका पुरश्चरण अठारह लाख अथवा अठारह हजार जप का है, कलियुग में तो इससे भी चौगुना जपना चाहिए।
श्री हयग्रीव मूल मंत्र
उद्गीथ प्रणवोद्गीथसर्ववागीश्वरेश्वर ।
सर्ववेदमयाचिन्त्य सर्व बोधय बोधय ॥
श्री हयग्रीव गायत्री मंत्र
वाणीश्वराय विद्महे हयग्रीवा धीमहि तन्नोः ह्यायग्रीवः प्रचोदयात् ॥
श्री हयग्रीव अन्य मंत्र
ज्ञानानन्दमयं देव निर्मल स्फटिकाकृतिम् ।
आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीव उपास्महे ॥
इस प्रकार पूजन करने व मंत्र जपने पर भगवान हयग्रीव प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

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